PM केयर्स को फॉरेन फंडिंग आसान, लेकिन FCRA नियमों में सख्ती से NGOs की फॉरेन फंडिंग मुसीबते बढ़ी

कोरोना में दूसरों की मदद करने वाले NGOs और सामाजिक कार्यकर्ता भी परेशान हैं। आपदा को अवसर बनाने वालों से उनको सामना करना पड़ रहा है। साथ ही प्रशासन भी उन्हें शक की नजर से देख रहा है। यही नहीं, विदेशी मदद से जुड़े नियमों में सख्ती ने भी उनकी मुसीबतों को बढ़ा दिया है।

विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में किए गए बदलावों के बाद अब बहुत कम ही NGO बचे हैं, जो सीधे विदेशों से दान ले सकते हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब खुद सरकार अन्य देशों से मदद लेने के लिए मजबूर है।

22,400 में सिर्फ 3600 NGOs विदेशी मदद पाने के हकदार
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​डेवलपऐड फाउंडेशन के मुताबिक देश में 22,400 NGO के पास एक्टिव FCRA लाइसेंस है। इसमें से केवल 16% यानी 3600 NGO ही नए नियमों के अंतर्गत आते हैं और 1 अप्रैल के बाद विदेश से सीधी मदद पा सकते हैं।

विडंबना यह है कि 30 अप्रैल को हुई एक मीटिंग में पीएम नरेंद्र मोदी ने केंद्र के उच्चस्तरीय अधिकार प्राप्त समूहों के साथ एक बैठक की। जिसमें कोरोना से निपटने के लिए बनाए गए इन समूहों से मोदी ने कहा, ‘स्वास्थ्य सुविधाओं पर जो दबाव है, उसे कम करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद कैसे ली जा सकती है, इसके तरीके ढूंढ़े जाएं और उन्हें उन कामों में लगाया जाए, जिनके लिए किसी खास योग्यता की जरूरत नहीं है।’

ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर ने कहा, ‘ये शब्द तभी काम के होंगे, जब फैसलों में भी दिखें। सरकार ने देश में NGO का काम करना और मुश्किल कर दिया है। नए नियमों के बाद NGO काम करने के दौरान मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। फिलहाल कई सारी संस्थाएं बहुत मुश्किल में हैं। ये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में FGRA एकाउंट नहीं खोल पा रही हैं, जिससे अब उनको वो पैसे नहीं मिल पा रहे हैं, जो पहले उन्हें कोविड से मदद के लिए मिलते।’

सरकारी प्रशासन भी बना रहा है निशाना
दिल्ली की एक सामाजिक कार्यकर्ता सबा ने मिंट को बताया, ‘जबकि लोग बेशर्मी से बहुत महंगे दामों पर दवाएं बेच रहे हैं और एंबुलेंस मुहैया करा रहे हैं। पुलिस ने दिल्ली में हमारी टीम के वॉलंटियर्स से 25 सिलेंडर जब्त कर लिए। जबकि हमने अपने दोस्तों की मदद से कुछ पैसे जुटाए थे और लोगों को मुफ्त में ऑक्सीजन दे रहे थे।’

NGO अन्य राज्यों में भी ऐसी समस्या झेल रहे हैं। जैसे जम्मू-कश्मीर में गवर्नर मनोज सिन्हा ने 6 मई को किसी भी प्राइवेट सोसाइटी या NGO को ऑक्सीजन सप्लाई करने पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी थी। इससे NGOs प्रभावित हुए।

NGO कार्यकर्ताओं को भी बनाया जा रहा निशाना
उत्तर प्रदेश के CM योगी आदित्यनाथ ने 25 अप्रैल को वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक की और उन्हें ‘डर’ फैलाने वाले ‘भ्रामक’ सोशल मीडिया पोस्ट के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट और नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की ओर से 30 अप्रैल को राज्यों के प्रशासन को इसके खिलाफ चेतावनी दी गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासन अगर फिर भी मेडिकल मदद मांग रहे नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करता है तो उसके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश के बाद भी सबा जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का प्रयोग बंद कर दिया है।

मुरादाबाद की मूल निवासी सबा कहती हैं, ‘मेरे लिए सोशल मीडिया पर काम करना सुरक्षित नहीं है। मेरे राज्य में न सिर्फ कार्यकर्ता बल्कि जिन्हें मदद चाहिए, उन्हें भी निशाना बनाया जा रहा है।’

बड़े NGO के छोटे NGO को विदेशी मदद देने पर भी पाबंदी
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​ऑक्सफैम के बेहर कहते हैं, ‘NGO को निराश किया गया है, खलनायक बनाया गया है और कमजोर कर दिया गया है। न सिर्फ NGO में काम करने वालों के लिए यह बुरा है बल्कि इससे समाज को भी नुकसान हो रहा है। महामारी से पहले एक साल में भारत के NGO औसतन 16,800 करोड़ रुपए की विदेशी मदद पाते थे। जो भारत में खर्च होने वाली दान की कुल मदद का 1/4 होता था। जब इस मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है, तो इसमें से ज्यादातर मदद खत्म हो चुकी है।’

इतना ही नहीं मदद आने के बाद उसे खर्च कहां किया जाए, इसमें भी नए नियम समस्या खड़ी कर रहे हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के पूर्व डायरेक्टर आकार पटेल कहते हैं, ‘कानून में हुए बदलाव बड़े NGO को विदेशों से आई रकम छोटे NGO को देने से रोकते भी हैं। जबकि ये छोटे NGO ही जमीन पर असली काम कर रहे हैं। इससे स्वास्थ्य सहित अन्य कई सेक्टर पर बहुत बुरा प्रभाव हुआ है।’

NGO के पास जगह नहीं, कर्मचारियों को भी निकाल रहे
नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया (NFI) के बिराज पटनायक ने कहा, ‘FCRA कानूनों में बदलाव से पहले NFI करीब 50 संस्थाओं को 15 करोड़ रुपये की रकम दे रही थी, जो अब संभव नहीं रह गया है। ऐसे में जब हम फंड को उन तक नहीं पहुंचा पा रहे, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है तो हम विदेशी संस्थाओं के आने वाली ज्यादातर मदद के लिए मना कर दे रहे हैं। इससे सिविल सोसाइटी की समाज के सबसे गरीब और कमजोर लोगों की मदद कर पाने की क्षमता घटी है।’

NGO को भारी नुकसान हो रहा है। पर्याप्त आर्थिक मदद न मिल पाने के चलते NGO न ही ऑफिस का किराया दे पा रहे हैं और न ही कर्मचारियों को सैलरी। जिसके चलते उन्हें छोटी जगह पर ऑफिस बनाना पड़ रहा है और कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ रही है।

FCRA अप्रूवल के बाद भी विदेशों से मदद लेना नामुमकिन
नए कानून के मुताबिक किसी NRI की ओर से दी गई मदद को गैर-FCRA फंड माना गया है लेकिन जब यही रकम किसी ऑनलाइन माध्यम से भेजी जाती है, तो बैंक इसे FCRA फंड ही मानते हैं क्योंकि यह विदेश से आने वाला पैसा है। भोपाल में विकास संवाद समिति नाम का NGO चलाने वाले सचिन जैन के मुताबिक, ‘ऐसे मामले में बैंक अधिकारी मदद भेजने वाले के पासपोर्ट और आधार की मांग करते हैं। कोई मदद करने वाला अपनी व्यक्तिगत जानकारियां हमें क्यों देगा? विदेशी फंडिंग पर अधिकारिक नीतियों को लेकर बहुत ज्यादा कंफ्यूजन है। ऐसे में हमारा आत्मविश्वास गिरा है और अब हमने विदेशों से ऑनलाइन फंड लेना ही बंद कर दिया है।’

पहले विकास संवाद समिति को NFI और चाइल्ड राइट्स और यू जैसी संस्थाओं से मदद मिलती थी। अब जैन कहते हैं, ‘राज्य सरकार और नीति आयोग की पहल के बाद भी महामारी से जमीन पर लड़ाई में हम कोई कोशिश नहीं कर पा रहे हैं।’

सिर्फ पीएम केयर्स को मिल सकती है बिना समस्या विदेशी मदद
अशोका यूनिवर्सिटी में सोशल इम्पैक्ट एंड फिलैन्थ्रॉपी सेंटर के डायरेक्टर इंग्रिड श्रीनाथ कहती हैं, ‘ये संस्थाएं स्थानीय समुदाय के स्तर पर काम करती हैं और किसी जगह की स्थानीय जरूरतों के बारे में इन्हें अच्छी जानकारी रहती है। लेकिन वर्तमान संकट के दौरान ये पैसों की कमी के चलते स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही हैं।’

उन्होंने कहा, ‘अंतिम उपलब्ध डेटा के मुताबिक भारत में कम से कम 4,107 संस्थाओं को 2018-19 में सबग्रांट के तौर पर कुल मिलाकर 1,768 करोड़ रुपए मिले थे। वर्तमान संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय पैसे और मेडिकल सहायता भेजने की हर संभव कोशिश कर रहा है, लेकिन वे ऐसा नहीं कर पा रहे। अब हर NGO को FCRA पाने के लिए SBI की मेन ब्रांच में एकाउंट खोलने को कहा गया है, यह प्रक्रिया बहुत कठिन और लंबी है। और जो NGO इसे भी पूरा कर ले रहे हैं, उन्हें भी केंद्रीय गृह मंत्रालय के वैरीफिकेशन का इंतजार करना पड़ता है, जिसमें फिर से बहुत समय लगता है।’

ऐसे में प्रो. श्रीनाथ के मुताबिक ऐसे में नए कानून का पालन किए बिना पीएम केयर्स फंड को ही विदेशी फंड मिल सकता है। वे कहती हैं, ‘लेकिन जब तक पीएम केयर्स फंड यह तय करेगा कि पैसा कहां खर्च किया जाना चाहिए, तब तक यह संकट खत्म हो जाएगा। हम इस समय सिस्टम के हर पड़ाव पर समस्या और देरी का सामना कर रहे हैं।’

विदेशी मदद बंद हुई, देश में भी मदद बढ़ाने का उपाय नहीं
श्रीनाथ के मुताबिक NGO के प्रति यह व्यवहार पहले के मुकाबले बहुत अलग है। 2001 में जब गुजरात में भूकंप आया तो जिन्होंने उससे निपटने के लिए दान दिया, उन्हें टैक्स में 100% की छूट दी गई थी और बचाव में मदद करने वाले विदेशी दानदाताओं को अपने आप FCRA क्लियरेंस दिया गया था। इस बार भी सरकार ऐसा कुछ कर सकती है ताकि जब NGO विदेश से मदद नहीं पा रहे तो घरेलू दानदाता ही मदद कार्य करने में उनकी मदद करें।

वहीं इस संकट के हालात में ऑक्सफैम के बेहर चाहते हैं कि सरकार FCRA और टैक्स कानूनों को कम से कम दो साल के लिए लागू किए जाने से रोक दे।

Content sources : https://www.bhaskar.com/db-original/news/pm-cares-fund-ngo-foreign-funding-struggle-due-to-narendra-modi-government-new-fcra-rules-128508373.html?_branch_match_id=857437460548082274&utm_campaign=128508373&utm_medium=sharing

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