मनुस्मृति को बनाया गया भारत के विनाश का मोहरा

जाति व्यवस्था का बीज बोने के लिए सबसे ज्यादा मनुस्मृति का सहारा लिया गया. हालांकि तमाम शोधों और पड़ताल से अब ये बात साबित हो चुकी है कि मनुस्मृति की मूल रचना में बाद के दिनों में निहित स्वार्थों और साजिश के तहत तरह-तरह के क्षेपक जोड़े गए. मनुस्मृति का पुनरावलोकन करने पर ये सच्चाई साफ तौर पर उभर कर सामने आ जाती है. डा. सुरेन्द्र कुमार ने मनु स्मृति का विस्तृत और गहन अध्ययन किया है.

डॉ. सुरेन्द्र कुमार ने खास तौर से मनुस्मृति में बाद के दिनों में जोड़े गए क्षेपकों की तथ्यात्मक आधार पर पड़ताल की है. आपको ये जानकर हैरानी होगी उन्होंने मनुस्मृति के 2658 श्लोकों में से 1471 यानी आधे से भी ज्यादा श्लोक क्षेपक पाए हैं. आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट से प्रकाशित अपनी किताब ‘मनु का विरोध क्यों?’ में उन्होंने मनुस्मृति में बाद में जोड़े गए क्षेपकों का वर्गीकरण इन आधारों पर किया है-

 विषय से बाहर की कोई बात हो

संदर्भ से विपरीत हो या अलग हो

पहले जो कहा गया, बाद वाले श्लोकों में उसके विपरीत बात कही गई हो

श्लोकों की अलग-अलग तरह से पुनरावृति हो

भाषा शैली मूल श्लोकों से भिन्न हो

वेद विरुद्ध हो

कहने की जरूरत नहीं कि डॉ सुरेन्द्र कुमार ने क्षेपकों को अलग करने का जो आधार बनाया है वो बिल्कुल वैज्ञानिक है. सवाल ये है कि आखिर एक ही ग्रंथकार अपने उसी ग्रंथ में अलग-अलग तरीके की बातें क्यों स्थापित करेगा. एक ही ग्रंथकार की भाषा शैली एक ही ग्रंथ में अलग-अलग कैसे हो सकती है. अफसोस ये है कि प्रमाणिक बातों को नजरअंदाज कर आम लोग वामपंथी इतिहासकारों की व्याख्या को ही सच मानने लगे, जिसकी वजह से जातिगत साजिश के बीज ने बाद के दिनों में खतरनाक विष वृक्ष का रूप ले लिया.

जन्म नहीं कर्म के आधार पर थी प्राचीन वर्ण-व्यवस्था
आपको ये जानकर हैरानी होगी जिस तरह रवांडा में हूतू और टुट्सी समुदाय पशुधन के आधार पर जन्म के बाद भी परिवर्तित हो जाते थे वैसे ही प्राचीन भारत में भी जन्म के बाद कर्म के आधार पर वर्ण बदल जाते थे. इसका प्रमाण वही मनुस्मृति है जिसे पहले अंग्रेजों और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने जाति व्यवस्था स्थापित करने वाला ग्रंथ कहकर दुष्प्रचारित किया. मनुस्मृति के 10वें अध्याय का 65वां श्लोक सबसे बड़ा प्रमाण है.
 
शूद्रो ब्राह्मणताम् एति, ब्राह्मणश्‍चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात्तथैव च ॥

आइये इस श्लोक का अर्थ भी जान लेते हैं- ‘गुण, कर्म, योग्यता के आधार पर ब्राह्मण,शूद्र बन जाता है और शूद्र ब्राह्मण. इसी प्रकार क्षत्रियों और वैश्यों में भी वर्ण परिवर्तन हो जाता हैं.’
 
जरा सोचिए जिस ग्रंथ में साफ तौर पर लिखा है कि गुण कर्म योग्यता के आधार पर वर्ण परिवर्तित हो जाता है उसका ग्रंथकार अपनी ही बात को काटते हुए उसी ग्रंथ में ये क्यों लिखेगा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जन्म के आधार पर तय होते हैं.  

साफ है कि जन्म के आधार पर जाति तय करने वाले जिन श्लोकों का उदाहरण वामपंथी इतिहासकार देते हैं उसे मनुस्मृति में बाद के दिनों में जोड़ा गया होगा. अगर ये बात सच है कि प्राचीन वैदिक और सनातन ग्रंथों में क्षेपक जोड़े गए तो सोचिए इसके पीछे कितना शातिर दिमाग रहा होगा और जरा उन लोगों के बारे में सोचिए जिन्होंने हकीकत जानते हुए भी वैदिक ग्रंथों के मूल कथ्यों को नजरअंदाज कर क्षेपकों को ही प्रचारित-प्रसारित किया. 

अब आप इस मामले को रवांडा की घटना से जोड़कर देखिए आपके दिमाग की बत्ती जल जाएगी और साजिश की तमाम परतें आपके दिमाग में उधड़नी शुरू हो जाएंगी.  आप ये मत भूलिए कि फिरंगियों के मन में भारतीयों के लिए उनता ही सम्मान था जितना जर्मन्स या बेल्जियन्स के मन में रवांडा के लोगों के प्रति था.

sources:https://zeenews.india.com/hindi/zee-hindustan/pride-of-india/brutal-history-of-rawanda-is-an-example-for-indian-caste-based-society/781250?fbclid=IwAR3iAwl52YAwEqY4jm7pSP_ylffWJC05ObrveGV4YwOwu1jyotCOQdJ9_Lc

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